🪖❤️👵 माँ का इंतज़ार: प्रेम और कर्तव्य की कहानी 🇮🇳
सुबह के पाँच बजे थे।
अजय का बैग तैयार था, वर्दी पर लगे बैज चमक रहे थे।
आँगन में माँ चुपचाप खड़ी थी। न कुछ कह रही थी, न आँसू बहा रही थी। बस अपने बेटे को देख रही थी, मानो उस एक पल में वर्षों का स्नेह समेट लेना चाहती हो।
अजय ने झुककर माँ के चरण छुए।
"माँ, चलता हूँ... देर हो रही है।"
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"रुक जा बेटा, तेरी पसंद का हलवा बना दूँ।"
अजय मुस्कुरा दिया।
"माँ, ड्यूटी इंतज़ार नहीं करती। देश पहले बुला रहा है।"
जाते-जाते माँ ने उसे गले लगा लिया। वह केवल एक आलिंगन नहीं था, बल्कि एक माँ का अपनी पूरी दुनिया को सीने से लगाने का पल था।
दरवाज़े तक छोड़ने आई तो अजय ने पलटकर कहा,
"माँ, रोना मत। तेरे आशीर्वाद के सहारे ही तो हर ड्यूटी निभाता हूँ।"
माँ ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"मैं रोऊँगी नहीं बेटा... बस तेरे लौटने का इंतज़ार करूँगी।"
अजय आगे बढ़ गया। कंधे पर बैग था और कदमों में कर्तव्य की दृढ़ता।
पीछे दहलीज़ पर माँ खड़ी रही... आँखों में दुआएँ और मन में उम्मीद।
उस दिन के बाद जैसे माँ का कैलेंडर बदल गया।
अब उसके लिए तारीख़ों का महत्व नहीं था।
हर सुबह एक उम्मीद लेकर आती—
"शायद आज आएगा।"
और हर शाम कह जाती—
"कोई बात नहीं... कल सही।"
वह अक्सर बेटे की तस्वीर से बातें करती—
"बेटा, खाना समय पर खा लेना... अपना ध्यान रखना।"
गाँव वाले पूछते,
"अम्मा, कब आएगा?"
माँ बस इतना कहती,
"मुझे भरोसा है, जब उसकी ड्यूटी पूरी होगी, वह ज़रूर लौटेगा। जब तक साँस है, तब तक आस है।"
उस घर में आज भी दो साथी रहते हैं—
एक माँ, और दूसरा उसका इंतज़ार।
और कहीं दूर सीमा पर एक बेटा अपना कर्तव्य निभा रहा है,
यह जानते हुए कि उसके पीछे उसके परिवार का विश्वास और पूरे देश का स्नेह खड़ा है।
माँ का प्रेम और बेटे का कर्तव्य—दोनों अपने-अपने स्थान पर महान हैं।
🙏 उन सभी माताओं को सादर नमन, जिनके आशीर्वाद और धैर्य से हमारे सैनिक अपना कर्तव्य निभा पाते हैं।
जय हिंद। 🇮🇳

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